Sunday, March 22, 2009

सागर हु अपने वतन का पुजारी !!


कोई है बहरे चमन का पुजारी कोई है गुलो आसमान का पुजारी !

बूते मौलवी को कोई पूजता है कोई कश्का ऐ बरहम का पुजारी !

गुलो में गुल्माने जमजम है कोई कोई मौजे गंगा जमुना का पुजारी !

मगर मेरा जौके पस्तिश जुदा है मै सागर हु अपने वतन का पुजारी !!
सागर
न जुन्नार का गम न तस्बीह का गम ! दिमागी गुलामी से आजाद हु मै !!
बूजे हुए से दीपक तुम , मै थकी हुई अंधियारी!!
अपना ही बुतकदा सज़ा अपने ही बुत पर ज़ोर ला ! तेरे दिमागों दिल पे हो दैरो रहम का बार क्यो ?
झनून ऐ खुदी का ये अय्नाज़ तो देखो !!
जब मौज आई खुदा हो गए हम !!
..सागर
हम नवां कोई नही है वह चमन मुजको दिया
हम वतन बात न समजे वह वतन मुजको दिया
फिराक
ये नही मुमकिन तो फीर ये दोस्त वीराने में चल !!
मुन्तजिर है एक तूफान ऐ बला मेरे लिए अब भी जाने कितने दरवाजे है व मेरे लिए !
पर मुसीबत है मेरा अहदे वफ़ा मेरे लिए .अ य ग में दिल क्या करू
मजरुह
अब कहा में धुन्धने जाऊ सुकू को अ य खुदा ?
इन जमीनों में नही ,इन असमानों में नही !!
जब्बी
में रकाबी में पियालो में महक सकता हु !
चाहिए बस लबो रुखसार का साया मुजको !!
जाफरी
यु ही कब तलक खुदाया गेम जिंदगी को निबाहे !
कही जुल्मातो में गिर कर है तलाशे दस्ते रहबर !!
मजरुहEISE
AISE ही कई लम्हों से गुजर गए है हम
अच्छासा दौर फिरभी नज़र आया है !!


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