हरि बिन भ्रमे भयो संसारी
यथा ज्ञान तथा दर्शन पाई
सबको विविध दिखाई
ज्ञानानुसार दर्शन होते है सबको
सबको अपना निज ज्ञान है भिन्न भिन्न
अतः अपने अपने हिसाब से होते है दर्शन
गुरु नामदेव की जिद क्या काम की
जो हठ की मात पिता को दर्शन की
दरजी का ज़ीरो
अपने अपने हिसाब से मिलते है अंधेरे आसान
तू सूरज है जलते रहना
सपने सही लगते है फिर भी भूल जाते है
जाने वाले भी क्या ये कहते है फंसे हम को क्या
सपनो में लगाता गोता हु
लगाया है यहां कम तो नही यू
जहा माया है वही विविधा है
एकत्व आध्यात्म है
विविधा की पराकाष्ठा अनेकांत है
यहां कयामत की बात है
चारों दिशा है हरि भरी ! कहा जाय राजू !!
और याद रहे जैन विचार आत्मा
कृष्ण की फिलोसोफी
और संसार है
बुद्ध तो आध्यात्म है
शंकराचार्य तो आध्यात्म लीनता है
शेयरिंग संसार मे देखो




